दोष हवाओं का था या फूल ही थे हल्के से,नाज़ुक से, जो सह न पाए मंद मुदित पवन का वेग भी! सुबह-सुबह चादर से कुछ दूर मिट्टी में औंधे मुँह पड़े मिले कुछ फूल... हर दिन की तरह... विरह की पीड़ा इतनी भा गई है या तुम हो मानिनी मीरा से हठीले ! हे हरसिंगार के फूल! किस आस में रात भर महकते हुए टिके रहते हो जो पौ फटते ही टूट जाती है! प्रेम में आस का टूटना स्वयं का टूटना ही तो है...
विरहणियों के दर्द से भरा, भारी है मन। बरसात के बाद की ठंडक और क्वार की धूप की नरमाई अपने में समेटे चटकती कलियाँ रात भर न जाने किस आस में झूमती आहिस्ता-आहिस्ता खिलती हुई सुबह अपनी सुगंध बिखेर ध्वस्त हो जाती हैं! आज एक चादर बिछा आई हूँ हरसिंगार के नीचे सुबह को कोई फूल मिट्टी में न मिले शायद... अच्छी नहीं लगती अधूरी प्रेम कहानियाँ...