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हरसिंगार -4

दोष हवाओं का था या फूल ही थे हल्के से,नाज़ुक से, जो सह न पाए मंद मुदित पवन का वेग भी! सुबह-सुबह चादर से कुछ दूर मिट्टी में औंधे मुँह पड़े मिले कुछ फूल... हर दिन की तरह... विरह की पीड़ा इतनी भा गई है या तुम हो मानिनी मीरा से हठीले ! हे हरसिंगार के फूल! किस आस में रात भर महकते हुए टिके रहते हो जो पौ फटते ही टूट जाती है! प्रेम में आस का टूटना स्वयं का टूटना ही तो है...
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हरसिंगार -3

विरहणियों के दर्द से भरा, भारी है मन। बरसात के बाद की ठंडक और क्वार की धूप की नरमाई अपने में समेटे चटकती कलियाँ रात भर न जाने किस आस में झूमती आहिस्ता-आहिस्ता खिलती हुई सुबह अपनी सुगंध बिखेर ध्वस्त हो जाती हैं! आज एक चादर बिछा आई हूँ हरसिंगार के नीचे सुबह को कोई फूल मिट्टी में न मिले शायद... अच्छी नहीं लगती अधूरी प्रेम कहानियाँ...

हरसिंगार -2

हरसिंगार भी जैसे किसी के प्रेम में होता है। रात्रि की नीरवता में न जाने किस आस में महकता रहता है। भोर में थककर चूर किसी विरहणी की भाँति धरा पर चित्त पड़ जाता है... मैं स्नेहसिक्त हथेलियों में भरकर समेट लाती हूँ भीतर। दिन में कुछ सूखे हुए, अपनी मादक सुगंध खो चुके फूल इधर-उधर गमलों में उलझे और मिट्टी में दबे भी मिल जाते हैं मुझे... कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ याद आती हैं।  विरहणी को समेटने भला कौन आता है...

हरसिंगार -1

हरसिंगार -1 बाहर हरसिंगार महक रहा है खिड़की से सुगंध भीतर तक आ कर  पुल्कित कर रही है। मैं बाहर आकर तस्वीर लेती हूँ तस्वीर सबसे साझा कर सकती हूँ सुगंध नहीं... प्रेम का भी कुछ ऐसा ही किस्सा है... जो दिखाई नहीं देता है, कहा नहीं जाता है,  दरअसल वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है!

दूरदर्शन जयपुर से कविता पाठ

सृजन कार्यक्रम में काव्य गोष्ठी 30 दिसम्बर 2015
मन का पिंजरा  अभिलाषाएं क़ैद उड़ना  चाहें उन्मुक्त्त गगन मे खोल दूँ पिंजरा....
When there are so many flowers blooming... When the air is so fragrant... Why to bleed with thorns??? Stay Blessed and Happy....