Skip to main content
मन का पिंजरा 
अभिलाषाएं क़ैद
उड़ना  चाहें
उन्मुक्त्त गगन मे
खोल दूँ पिंजरा....


Comments

Popular posts from this blog

दूरदर्शन जयपुर से कविता पाठ

सृजन कार्यक्रम में काव्य गोष्ठी 30 दिसम्बर 2015

हरसिंगार -1

हरसिंगार -1 बाहर हरसिंगार महक रहा है खिड़की से सुगंध भीतर तक आ कर  पुल्कित कर रही है। मैं बाहर आकर तस्वीर लेती हूँ तस्वीर सबसे साझा कर सकती हूँ सुगंध नहीं... प्रेम का भी कुछ ऐसा ही किस्सा है... जो दिखाई नहीं देता है, कहा नहीं जाता है,  दरअसल वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है!