विरहणियों के दर्द से भरा, भारी है मन।
बरसात के बाद की ठंडक और क्वार की धूप की नरमाई अपने में समेटे चटकती कलियाँ रात भर न जाने किस आस में झूमती आहिस्ता-आहिस्ता खिलती हुई सुबह अपनी सुगंध बिखेर ध्वस्त हो जाती हैं!
आज एक चादर बिछा आई हूँ हरसिंगार के नीचे
सुबह को कोई फूल मिट्टी में न मिले शायद...
अच्छी नहीं लगती अधूरी प्रेम कहानियाँ...
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