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हरसिंगार -2



हरसिंगार भी जैसे किसी के प्रेम में होता है। रात्रि की नीरवता में न जाने किस आस में महकता रहता है। भोर में थककर चूर किसी विरहणी की भाँति धरा पर चित्त पड़ जाता है...
मैं स्नेहसिक्त हथेलियों में भरकर समेट लाती हूँ भीतर।
दिन में कुछ सूखे हुए, अपनी मादक सुगंध खो चुके फूल इधर-उधर गमलों में उलझे और मिट्टी में दबे भी मिल जाते हैं मुझे...
कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ याद आती हैं। 
विरहणी को समेटने भला कौन आता है...

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हरसिंगार -1

हरसिंगार -1 बाहर हरसिंगार महक रहा है खिड़की से सुगंध भीतर तक आ कर  पुल्कित कर रही है। मैं बाहर आकर तस्वीर लेती हूँ तस्वीर सबसे साझा कर सकती हूँ सुगंध नहीं... प्रेम का भी कुछ ऐसा ही किस्सा है... जो दिखाई नहीं देता है, कहा नहीं जाता है,  दरअसल वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है!