हरसिंगार भी जैसे किसी के प्रेम में होता है। रात्रि की नीरवता में न जाने किस आस में महकता रहता है। भोर में थककर चूर किसी विरहणी की भाँति धरा पर चित्त पड़ जाता है...
मैं स्नेहसिक्त हथेलियों में भरकर समेट लाती हूँ भीतर।
दिन में कुछ सूखे हुए, अपनी मादक सुगंध खो चुके फूल इधर-उधर गमलों में उलझे और मिट्टी में दबे भी मिल जाते हैं मुझे...
कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ याद आती हैं।
विरहणी को समेटने भला कौन आता है...
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