दोष हवाओं का था या फूल ही थे हल्के से,नाज़ुक से, जो सह न पाए मंद मुदित पवन का वेग भी! सुबह-सुबह चादर से कुछ दूर मिट्टी में औंधे मुँह पड़े मिले कुछ फूल... हर दिन की तरह...
विरह की पीड़ा इतनी भा गई है या तुम हो मानिनी मीरा से हठीले !
हे हरसिंगार के फूल! किस आस में रात भर महकते हुए टिके रहते हो जो पौ फटते ही टूट जाती है!
प्रेम में आस का टूटना स्वयं का टूटना ही तो है...
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