Skip to main content

हरसिंगार -4



दोष हवाओं का था या फूल ही थे हल्के से,नाज़ुक से, जो सह न पाए मंद मुदित पवन का वेग भी! सुबह-सुबह चादर से कुछ दूर मिट्टी में औंधे मुँह पड़े मिले कुछ फूल... हर दिन की तरह...
विरह की पीड़ा इतनी भा गई है या तुम हो मानिनी मीरा से हठीले !
हे हरसिंगार के फूल! किस आस में रात भर महकते हुए टिके रहते हो जो पौ फटते ही टूट जाती है!

प्रेम में आस का टूटना स्वयं का टूटना ही तो है...

Comments

Popular posts from this blog

When there are so many flowers blooming... When the air is so fragrant... Why to bleed with thorns??? Stay Blessed and Happy....

हरसिंगार -2

हरसिंगार भी जैसे किसी के प्रेम में होता है। रात्रि की नीरवता में न जाने किस आस में महकता रहता है। भोर में थककर चूर किसी विरहणी की भाँति धरा पर चित्त पड़ जाता है... मैं स्नेहसिक्त हथेलियों में भरकर समेट लाती हूँ भीतर। दिन में कुछ सूखे हुए, अपनी मादक सुगंध खो चुके फूल इधर-उधर गमलों में उलझे और मिट्टी में दबे भी मिल जाते हैं मुझे... कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ याद आती हैं।  विरहणी को समेटने भला कौन आता है...